जो पकड़ पाता नहीं खरगोश का बच्चा ,

अपनी इक मुट्ठी में गज-ऊरज पकड़ डाला ।।

जो न गुब्बारा फुला सकता , बजाने को ,

आज उसने हाथ में तूरज पकड़ डाला ।।

आज तो जानूँ न क्या-क्या मुझसे हो बैठा ?

पत्थरों में फूल के मैं बीज बो बैठा ।

धूप में भी जो झुलस जाता है रात उसने ,

दोपहर का स्वप्न में सूरज पकड़ डाला ।।

( गज-ऊरज = बलिष्ठ हाथी , तूरज = तुरही जिसे उच्च शक्ति से फूँककर बजाया जाता है )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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