ज़ुल्फ़ों में तेरी टाँकने काँंटों में खिले गुल ,

हाथों को किया ज़ख़्मी मगर तोड़ के लाया ।।

अखरोट जो पत्थर से भी हैं फूटें बमुश्किल ,

ख़्वाहिश पे तेरी सर को पटक फोड़ के लाया ।।

आया है किसी सख़्त से भी सख़्त ये कैसा ?

आया हूँ तो जाने का तेरे वक़्त , ये कैसा ?

जाता था कहीं और मगर हाय रे ! ख़ुद को ,

तेरी ही सदा पर तो यहाँ मोड़ के लाया ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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