हाँ कई दिन से न था खाने को मेरे पास कुछ ।।

आगे भी रोटी के मिलने की नहीं थी आस कुछ ।।

भूख में इंसाँ को अपने मार मैं पशु बन गया ,

जाँ बचाने को चबाने लग गया मैं घास कुछ ।।

– डॉ. हीरालाल प्रजापति

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