लोग चलते रहे , दौड़ते भी रहे ,

कोई उड़ता रहा , मैं खड़ा रह गया ।।

बाद जाने के तेरे मैं ऐसी जगह ,

जो गिरा तो पड़ा का पड़ा रह गया ।।

सोचता हूँ कि कितने मेरे सामने ,

नाम तक भी न दारू का जिनने लिया ;

इक के बाद इक गुजरते गए दिन-ब-दिन ,

ज़िंदा मुझ जैसा क्यों बेवड़ा रह गया ?

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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