■ मुक्तक : 996 – रोज़गार की महत्ता

आँखें तो क्या हैं बल्ब सा ये सिर भी फूट जाए ।। क्या फ़िक्र हाथ – पाँव कोई काट – कूट जाए ।। लाज़िम मगर है मेरी नाक की सलामती को , छूटे न रोज़गार चाहे साँस छूट जाए ।।...Read more

■ मुक्तक : 995 – घाघरा

मुझको औरत न कहो आदमी हूँ मैं यारों , ग़म में पतलून से जो घाघरा मैं हो बैठा ।। दर्द ना क़ाबिले बर्दाश्त हो गया था तो , मर्द होकर भी सरेआम मैं भी रो बैठा ।। अपने जज़्बात सँभाले...Read more

■ मुक्तक : 994 – करूँ क्या ?

मैं क्यों बेज़ुबानों को जा-जा बकूँ कुछ ? करूँ बदकलामों से कैसे लड़ाई ? नहीं मुझमें है जब कोई बात ऐसी , कि हो हर तरफ़ मेरी चर्चा-बड़ाई ।। ये बदमाश कहती शरीफ़ों तलक को , कभी तो सुअर बोल...Read more

■ मुक्तक : 993 – घोर आश्चर्य !

वो मेरे लिए क्यों तड़पता नहीं है ? क्यों मिलने को इक पल न बेचैन होता ? चलो माना हँसता है महफ़िल में हरदम , तो तनहाई में भी कभी क्यों न रोता ? मुझे चाँद अपना जो कहते न...Read more

■ मुक्तक : 992 – बुरी आदतें

करूँ क्या मैं ? लेकिन ये सच है शुरू से , बुरी सुह्बतें मुझको लगतीं हैं अच्छी ।। न हरगिज़ जिन्हें चाहे करना ज़माना , वो सब हरक़तें मुझको लगतीं हैं अच्छी ।। सभी की पसंदों का दर्जा है आला...Read more