कौन सा ज़ह्र खा हमने जाँ छोड़ दी ,

बिन तुम्हारे भी जीने को जीते रहे ।।

ये अलग बात है साथ तुम थे तो सच ,

मुश्क़िलों से ज़ियादा सुभीते रहे ।।

गर्मियों की चिलकती हुई धूप में ,

हम दरख़्तों के साए में जा बैठकर ;

प्यास अपनी बुझाने को माज़ी में जा ,

तेरी यादों के शर्बत को पीते रहे ।।

-डॉ हीरालाल प्रजापति

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