वे ग़फ़्लत में मेरे आगे ज़रा सा क्या मटक बैठीं ;

मेरी तो बस के आँखों में , चुरा दिल , ले सटक बैठीं ।।

मैं बारिश की तमन्ना में पड़ा था अब्र को तकते ,

खुली ज़ुल्फें वे कर गीली , मेरे ऊपर झटक बैेठीं ।।

नहीं हँसते हैं वे लेकिन , जब हँसते हैं तो लगता है ,

किसी उजड़े चमन में हर तरफ कलियाँ चटक बैठीं ।।

बहुत चाहा मगर उनसे बिछड़ मैं भी न मर पाया ,

न वे मुझसे जुदा होते ही , फाँसी पर लटक बैठीं ।।

सुराखों से निकल आए , पहाड़ों से मेरे हाथी ,

न मानोगे सभी की साँप सी पूँछें अटक बैठीं ।।

अदावत कब मुझे मुझको तो , मेरी यारियाँ यारों ,

उठाकर आस्मानों से , ज़मीनों पर पटक बैठीं ।।

यक़ीनन हर अदा उनकी , फटाफट जानलेवा थी ,

मगर कुछ अटपटी बातें , मेरे दिल को खटक बैठीं ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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