चोर हो , डाकू हो , क़ातिल हो , ग़रीब हरगिज़ न हो ।।

आदमी कुछ हो , न हो बस , बदनसीब हरगिज़ न हो ।।

ज़िंदगी उस शख़्स की , क्या ज़िंदगी है दोस्तों ,

गर जहाँ में एक भी , जिसका हबीब हरगिज़ न हो ।।

हक़ नहीं बीमार होने , का उसे जिसकी न याँ –

हो सके तीमारदारी , औ’ तबीब हरगिज़ न हो ।।

हमको कब लाज़िम फ़रिश्ता , और कब शैतान ही ,

चाहिए इक आम इंसाँ , जो अजीब हरगिज़ न हो ।।

कोह पर चढ़ते हुए हो , सर पहाड़ी बोझ क्या ,

पीठ पर लेकिन किसी के , भी सलीब हरगिज न हो ।।

इक क़लमकार , उम्दा शायर , होके तू भूखा मरे ,

उससे बेहतर मस्ख़रा बन , जा अदीब हरगिज़ न हो ।।

( तबीब = चिकित्सक , कोह = पहाड़ )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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