इक उनका बुत बनाने मिट्टी को छानते हैं ।।

अपना लहू मिलाकर फिर उसको सानते हैं ।।

हैराँ न वो हमारे , रोने पे हो रहे हैं ,

हों मस्ख़रों को भी ग़म , शायद वो जानते हैं ।।

मैं उनको जाँ भी दे दूँ , वो ख़ुश ज़रा न होंगे ,

जाँ मुफ़्त की है मेरी ऐसा जो मानते हैं ।।

जिनको भुलाना शायद , मुमकिन न हो सकेगा ,

उनको ही भूल जाने , की रोज़ ठानते हैं ।।

कहते हैं ” हम नशे का मतलब नहीं समझते ” ,

वो रोज़-रोज़ ख़ुद ही , जो भंग छानते हैं ।।

छोटी से छोटी बातों पर लोग-बाग अब तो ,

फटकार-डाँट की जा , बंदूक तानते हैं ।।

अब सब्रो-ज़ब्त किसमें बाक़ी ज़रा-ज़रा में ,

बूढ़े भी नौजवानों सा ख़ूँ उफानते हैं ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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