यक़ीनन है शिकस्ता दिल जवाँ होकर भी वो वर्ना ।।

न कहता नौजवानों से मोहब्बत-इश्क़ से बचना ।।1।।

ख़ुुदा ने जब तुम्हें बख़्शी है सूरत चाँद से प्यारी ;

तुम्हारा जिस्म जैसे राजधानी की है फुलवारी ;

तुम्हें सिंगार से ज्यादा है फबती सादगी फिर क्या –

मुनासिब है यूँ ही सजने में ज़ाया वक़्त को करना ?2?

यक़ीनन है शिकस्ता दिल जवाँ होकर भी वो वर्ना ,

न कहता नौजवानों से मोहब्बत-इश्क़ से बचना ।।

अगर तेरा मोहब्बत में जो पड़ने का इरादा है ;

तो सुन ले सब शराबों से कहीं इसमें ज़ियादा है ;

अगर चढ़ जाए तो फिर ये किसी सूरत नहीं उतरे ,

वो कहता है नशा-ए-इश्क़ बिलकुल भी नहीं चखना ।।3।।

यक़ीनन है शिकस्ता दिल जवाँ होकर भी वो वर्ना ,

न कहता नौजवानों से मोहब्बत-इश्क़ से बचना ।।

मोहब्बत लाज़िमी इस उम्र में सबको कहानी में ;

लगे है इश्क़ ही जैसे हो सब कुछ नौजवानी में ;

मगर कहता है जो तो क्या ग़लत कहता है वो बोलो ?

“कभी मत कमसिनी में आशिक़ी के फेर में पड़ना ।।”4।।

यक़ीनन है शिकस्ता दिल जवाँ होकर भी वो वर्ना ,

न कहता नौजवानों से मोहब्बत-इश्क़ से बचना ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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