ग़ज़ल : 290 – चिढ़ है जन्नत से

चिढ़ है जन्नत से न फिर भी तू जहन्नुम गढ़ ।। अपने ही हाथों से मत फाँसी पे जाकर चढ़ ।।1।। तुझको रख देंगी सिरे से ही बदल कर ये , शेर है तू मेमनों की मत किताबें पढ़ ।।2।।...Read more

ग़ज़ल : 289 – तकने लगे हैं शौक़ से

तकने लगे हैं शौक़ से आईने अब अंधे ।। गंजे अमीरुल-ऊमरा रखने लगे कंघे ।।1।। जानूँ न वो कैसी बिना पर दौड़ते-उड़ते , ना पैर हैं उनके न उनकी पीठ पर पंखे ।।2।। ये जायदादो मिल्क़ियत , माया , ख़ज़ाने...Read more

ग़ज़ल : 288 – गाली

चाहता हूँ कि बकूँ उसको गाली पे गाली ।। लफ़्ज़ बस मुँह से निकलते हैं दो ही हट , साली ।।1।। हुस्न से लगती है मंदिर की सीता-राधा वो , है तवाइफ़ के भी क़िरदार से बड़ी वाली ।।2।। शाहख़र्च...Read more

ग़ज़ल : 287 – भारी-भरकम

बाहर रेल की पटरी से भारी-भरकम ।। अंदर बाँस से भी कुछ हल्के-फुल्के हम ।।1।। थककर चूर हैं लेकिन ख़ुद को जाने क्यों ? दिखलाते हैं हमेशा इकदम ताज़ादम ।।2।। चेहरे से यूँ नदारद रखते हर पीड़ा , बस सब...Read more