बाहर रेल की पटरी से भारी-भरकम ।।

अंदर बाँस से भी कुछ हल्के-फुल्के हम ।।1।।

थककर चूर हैं लेकिन ख़ुद को जाने क्यों ?

दिखलाते हैं हमेशा इकदम ताज़ादम ।।2।।

चेहरे से यूँ नदारद रखते हर पीड़ा ,

बस सब लोग समझ जाते हम हैं बेग़म ।।3।।

मैक़श से न कभी कहना मै को गंदी ,

उसका मक्का है मैख़ाना , दारू ज़मज़म ।।4।।

भागमभाग किया करते , सब है फिर भी ,

क्यों जीने की ही ख़ातिर होते हैं बेदम ।।5।।

कुछ ही अंधे करें मिल बातें चश्मों की ,

लँगड़े ख़्वाब में सब नाचें ना छम-छम-छम ।।6।।

पैसा बंद हुआ रुपया भी कमक़ीमत ,

महँगे सब तो हुए डॉलर , दीनारोदिरम ।।7।।

हैराँ हूँ हैं जनाज़े में शामिल लाखों ,

लेकिन दिखती नहीं इक की भी आँखें नम ।।8।।

माना पास नहीं अपने लेकिन ख़ुश हैं ,

जाएदाद , ज़मीं , सोना-चाँदी सी रक़म ।।9।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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