चाहता हूँ कि बकूँ उसको गाली पे गाली ।।

लफ़्ज़ बस मुँह से निकलते हैं दो ही हट , साली ।।

हुस्न से लगती है मंदिर की सीता-राधा वो ,

है तवाइफ़ के भी क़िरदार से बड़ी वाली ।।

शाहख़र्च इतनी है इतनी कि हो यक़ीं कैसे ,

वो किया करती है दिन-रात सिर्फ़ हम्माली ।।

अपनी बोली से तो कोयल का चूज़ा लगती है ,

है इरादों से मगर ख़ौफ़नाक और काली ।।

जब जला लेती है होली दिलों की रूई सी ,

तब मनाती है शबोरोज़ ईद-दीवाली ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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