चिढ़ है जन्नत से न फिर भी तू जहन्नुम गढ़ ।।

अपने ही हाथों से मत फाँसी पे जाकर चढ़ ।।1।।

तुझको रख देंगी सिरे से ही बदल कर ये ,

शेर है तू मेमनों की मत किताबें पढ़ ।।2।।

तू जगह अपनी पकड़ रख नारियल जैसे ,

एक झोंके से निबौली-बेर सा मत झड़ ।।3।।

बन के क़ाबिल कर ले हासिल कोई भी हक़ तू ,

हाथ मत फैला किसी के पाँव मत गिर पड़ ।।4।।

बनके गंगा पाक रह औरों को भी कर साफ़ ,

इक जगह ठहरे हुए पोखर सा तू मत सड़ ।।5।।

तान सीना सर उठाकर चल है गर मासूम ,

इस तरह से तू ज़मीं में शर्म से मत गड़ ।।6।।

वो जो माल अपना भी औरों पर लुटा रखते ,

उनपे मत चोरी-जमाखोरी की तोहमत मढ़ ।।7।।

पहले चौपड़ ताश ही मा’नी जुआ के थे ,

अब खुले मैदाँ के भी सब खेल हो गए फड़ ।।8।।

सब ग़ुबार अपना निकल जाने दे मेरी हया ,

बाल के गुच्छों सी मत नाली में आकर अड़ ।।9।।

कितना ही कमज़ोर हो पर अपने दुश्मन से ,

होशियारी और सब तैयारियों से लड़ ।।10।।

टाट पे मखमल का मत पैबंद सिल पगले ,

क़ीमती हीरे को लोहे में नहीं तू जड़ ।।11।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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