मुक्तक : 950 – शराब

सच ही था या कि जगती ,आँखों ने ख़्वाब देखा ।। अच्छे-भले को लुक-छिप ,होते ख़राब देखा ।। करता था रात-दिन जो ,पीने की हद बुराई , उसको ख़रीदते कल ,मैंने शराब देखा !! -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more