मुक्तक : 952 – नज़रीया

मत ज़माने की ख़ुदाई की नज़र से देखो ।। तुम न दारू को बुराई की नज़र से देखो ।। आज लबरेज़ हो ग़म से तो बदल नज़रीया , इसको इक बार दवाई की नज़र से देखो ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more