मुक्तक : 953 – वकालत

काग़ज़ से भी ज़ियादा पतली है मेरी हालत ।। होती ही जाए दिन-दिन ये ज़िन्दगी तवालत ।। फ़िक़्रे मआश उस पर नाकाम इश्क़ के ग़म , फिर भी शराब की मैं करता नहीं वकालत ।। ( तवालत = सिरदर्द ,...Read more