आँखों को लग गए थे , कुछ इस क़दर वो अच्छे ,

मरने तलक भी दिल में , ज़िंदा बने रहे थे ।।

हम जितनी गर्मजोशी , से पेश आए उनसे ,

उतना वो हमसे मिलते , वक़्त अनमने रहे थे !!

दिखने में हम भी बाँके , थे नौजवाँ सजीले ।

थोड़े-बहुत मुज़र्रद , इक हद तलक रँगीले ।

जानें न क्यों मगर वो , रहकर पड़ोस में भी ,

ताउम्र हमसे झूला , पुल से तने रहे थे ?

( मुज़र्रद = ब्रह्मचारी )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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