मुक्तक : 958 – गोवा

फ़ाख़्ताएँ मिलीं , बुलबुलें अनगिनत , था ज़रूरी बस इक राज-सारस हमें ।। ज़र ख़ुमों के ज़ख़ीरों की थी कब तलब , लाज़िमी था फ़क़त एक पारस हमें ।। इस क़दर अपनी क़िस्मत के थे दास हम । शेर थे...Read more