फ़ाख़्ताएँ मिलीं , बुलबुलें अनगिनत ,

था ज़रूरी बस इक राज-सारस हमें ।।

ज़र ख़ुमों के ज़ख़ीरों की थी कब तलब ,

लाज़िमी था फ़क़त एक पारस हमें ।।

इस क़दर अपनी क़िस्मत के थे दास हम ।

शेर थे और चरते रहे घास हम ।

हर घड़ी रुख़ रखा लाख गोवा तरफ़ ,

पाँव ले – ले गए पर बनारस हमें ।।

( ज़र = स्वर्ण , ख़ुम = मटका , ज़ख़ीरा = भण्डार )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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