मुक्तक : 960 – ख़त

क्या है वो , कैसी है वो , तारीफ़ में उसकी , हर कभी कब एकदम से ख़त उसे लिखता ? हर कहीं पर बैठ भी कब जल्दबाज़ी में , कब तकल्लुफ़ को क़सम से ख़त उसे लिखता ? दिल...Read more

मुक्तक : 959 – वापसी

महब्बत के अपने शिकंजे में कस वो , कभी करने आज़ाद हरगिज़ न आए ।। मैं लौटूँगा कहकर कई साल पहले , जो जाने के फिर बाद हरगिज़ न आए ।। उन्हें इस क़दर रफ़्ता – रफ़्ता बमुश्किल , भुलाते...Read more