महब्बत के अपने शिकंजे में कस वो ,

कभी करने आज़ाद हरगिज़ न आए ।।

मैं लौटूँगा कहकर कई साल पहले ,

जो जाने के फिर बाद हरगिज़ न आए ।।

उन्हें इस क़दर रफ़्ता – रफ़्ता बमुश्किल ,

भुलाते – भुुलाते मगर जब मैं भूला ,

तो आती न ज्यों जान मुर्दे में वापस ,

मुझे उनकी अब याद हरगिज़ न आए ।।

-डॉ हीरालाल प्रजापति

This article has 2 comments

  1. Neeraj Vishwakarma Reply

    क्या बात है सर,
    अक्सर याद आती है उनको उनके भूल जाने के बाद।

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