मुक्तक : 961 – मृत्यु दो

एक ही अपने ग़म का है चारा सुनो , जो बची हैं वो साँसें उखाड़ो अभी ।। ज़हर भी खा के मैं साफ़ बच जाऊँ जो , तो ज़मीं में गढ़ा खोद गाड़ो अभी ।। जिस्म बेशक़ लगे ख़ूबसूरत मेरा...Read more