एक ही अपने ग़म का है चारा सुनो ,
जो बची हैं वो साँसें उखाड़ो अभी ।।
ज़हर भी खा के मैं साफ़ बच जाऊँ जो ,
तो ज़मीं में गढ़ा खोद गाड़ो अभी ।।
जिस्म बेशक़ लगे ख़ूबसूरत मेरा ,
छोड़ती जा रही साथ सेहत मेरा ,
रूह माँगे मेरी बस लिबास अब नया ,
कुछ रफ़ू ज़िंदगी और फाड़ो अभी ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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