मुक्तक : 962 – वज़्न

मेरी नज़र ने ऐसा , मंज़र कभी न पाया !! बेसाख़्ता उसे तक , दिल में ख़याल आया ।। जितना है वज़्न उसका , उससे बहुत ज़ियादा , होगा मेरा तो भारी , घटता हुआ भी साया ।। -डॉ. हीरालाल...Read more