मेरी नज़र ने ऐसा , मंज़र कभी न पाया !!
बेसाख़्ता उसे तक , दिल में ख़याल आया ।।
जितना है वज़्न उसका , उससे बहुत ज़ियादा ,
होगा मेरा तो भारी , घटता हुआ भी साया ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

This article has 3 comments

  1. Neeraj Vishwakarma Reply

    सही कहा सर,
    आजकल हर गरीब के पास जरूरत से ज्यादा दुख है, और हर अमीर के पास जरूरत से ज्यादा सुख है।

  2. डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक Reply

    अच्छा मुक्तक है।
    ब्लॉग का यह फार्मेट नहीं जमा जी।
    इससे न तो फीड आती है और टिप्पणी करने में भी बहुत झमेला है।
    समय की कमी सबके पास होती है।
    अतः कोई इस झमेले में नहीं पड़ेगा कि वह नाम और ईमेल के साथ वेबसाइड भी टाइप करे।
    अपनी इस अप्रिय टिप्पणी के लिए क्षमा चाहता हूँ।

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