मुक्तक : 963 – हाय !

मेरी आँखें न थीं , फिर भी मेरे लिए , दुलहनों सी वो सजती-सँवरती रही ।। जानकर भी कि मैं , एक पत्थर हूँ वो , मुझसे बेइंतिहा , प्यार करती रही ।। लोग कहते हैं घायल थी मेरे लिए...Read more