मुक्तक : 965 – त्रिशंकु

  मंज़िल यों ढूँढता हुआ , भटक रहा हूँ मैं ।। शायद लगेगा आपको , मटक रहा हूँ मैं ।। मेरे लिए ज़मीं कहाँ , न आस्मान है , बनकर त्रिशंकु सच कहूँ , लटक रहा हूँ मैं ।। -डॉ....Read more

मुक्तक : 964 – गाँव

क्या हो गया कि मुझको हर एक चीज़ आजकल , सच चाहिए तो चाहिए बस उसके गाँव सी ? जब से मिला हूँ उससे लगे वो ही कूकती , करते हैं और सब तो महज काँव-काँव सी ।। उसकी गली...Read more