क्या हो गया कि मुझको हर एक चीज़ आजकल ,
सच चाहिए तो चाहिए बस उसके गाँव सी ?
जब से मिला हूँ उससे लगे वो ही कूकती ,
करते हैं और सब तो महज काँव-काँव सी ।।
उसकी गली भी मुझको लगे शाहराह क्यों ?
कच्चा मकान उसका लगे बारगाह क्यों ?
साया लगे है शह्र का अपने अलाव सा ,
क्यों धूप उसके गाँव की बरगद की छाँव सी ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *