मंज़िल यों ढूँढता हुआ ,

भटक रहा हूँ मैं ।।

शायद लगेगा आपको ,

मटक रहा हूँ मैं ।।

मेरे लिए ज़मीं कहाँ ,

न आस्मान है ,

बनकर त्रिशंकु सच कहूँ ,

लटक रहा हूँ मैं ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

This article has 2 comments

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *