बर्फीली चट्टानों पर जा-जा लेटे दुनिया ,
पर अंगारों को छाती से चाँप रहा हूँ मैं !!
लोग उघाड़े सब फिरते फर-फर झलते पंखे ,
स्वेटर पहने शॉल बदन पर ढाँप रहा हूँ मैं !!
मेरी सुर्ख़ अँगीठी , मेरी कॉफी-चाय-सुरा ,
मत पूछो अब की है मेरा कितना हाल बुरा ?
पिछली सर्दी में कब मुझको ठण्ड लगी लेकिन ,
इस गर्मी में साथ न तुम तो काँप रहा हूँ मैं !!
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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