नाकामियों से अपनी , इक रोज़ यास में भर ,
सोचा कि आज तो कुछ , करके ही मैं रहूँगा ।।
बेकार हूँ अगर मैं , तो फिर कोई बताए ;
अब और आगे मर-मर , जीकर मैं क्या करूँगा ?
खाकर क़सम चला इक , मैं डूबने को चुपके ,
जब डूबने को आया , तो पार आ गया मैं ;
फिर इक क़सम उठाई , हालात कैसे भी हों ,
क़ातिल बनूँगा लेकिन , ख़ुदकुश नहीं बनूँगा ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

This article has 2 comments

  1. Neeraj Vishwakarma Reply

    बिल्कुल सर,
    हर काली रात के बाद सुनहरा सवेरा जरूर आता है।🙏

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