मुक्तक : 969 – ग़ज़ल

होठों को पंखुड़ी न कहूँगा गुलाब की , आँखों को जाम का न बदल कह सकूँगा मैं ।। बोलूँगा मैं कनेर को फिर तो कनेर ही , चंपा को भूलकर न कँवल कह सकूँगा मैं ।। लफ़्ज़ों में मेरे दिखती...Read more