होठों को पंखुड़ी न कहूँगा गुलाब की ,
आँखों को जाम का न बदल कह सकूँगा मैं ।।
बोलूँगा मैं कनेर को फिर तो कनेर ही ,
चंपा को भूलकर न कँवल कह सकूँगा मैं ।।
लफ़्ज़ों में मेरे दिखती जो तर्तीब वो हो तुम ;
मेरी तो शायरी की जो तर्ग़ीब वो हो तुम ;
दीदार गर न होगा तुम्हारा तो फिर कहो ,
ताज़ा-तरीन कैसे ग़ज़ल कह सकूँगा मैं ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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