मुक्तक : 970 – कलमा

उसे बैठ कर लिख रहा हूँ मैं यूँ ख़त , कि लिखता है जैसे कोई नाम रब का ।। उसे प्यार करता हूँ कुछ इस तरह से , कि करता है जैसे कोई काम रब का ।। रहूँ सख़्त मस्रूफ़...Read more