उसे बैठ कर लिख रहा हूँ मैं यूँ ख़त ,
कि लिखता है जैसे कोई नाम रब का ।।
उसे प्यार करता हूँ कुछ इस तरह से ,
कि करता है जैसे कोई काम रब का ।।
रहूँ सख़्त मस्रूफ़ या फुर्सतों में ,
उसे लम्हा भर भी नहीं भूलता मैं ,
यूँ लूँ नाम उसका कि जैसे मुसल्माँ ,
पढ़े कलमा कोई सुब्हो-शाम रब का ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

This article has 2 comments

  1. Neeraj Vishwakarma Reply

    बहुत खूब सर पूरी इबादत के साथ लिखा आपने।

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