मुक्तक : 972 – छुरा

सीने से चाँप रखने , वाले मुझे हमेशा , हैरान हूँ , रहे हैं , क्यों आज दुरदुरा वो ? जो मानते थे कल तक , इक फूल नर्मो-नाज़ुक , मेरी उसी क़लम को , कहते हैं अब छुरा वो...Read more