सीने से चाँप रखने , वाले मुझे हमेशा ,
हैरान हूँ , रहे हैं , क्यों आज दुरदुरा वो ?
जो मानते थे कल तक , इक फूल नर्मो-नाज़ुक ,
मेरी उसी क़लम को , कहते हैं अब छुरा वो !!
करता था मिलके उनसे , जो बेशुमार बातें ,
लिखता था ख़त में वैसी , ही बार-बार बातें ,
जिन बातों को वो कहते , थकते नहीं थे अच्छा ,
उन बातों का ही बैठे , हैं मानकर बुरा वो ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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