हमदर्द जब नहीं वो , अपना रहा तो अब से ,
हर दर्द उफ़ किए बिन , सहना मैं सीख लूँगा ।।
गज़ भर ज़बान रखकर , भी धीरे-धीरे गूँगा –
बन जाउँगा रे चुप-चुप , रहना मैं सीख लूँगा ।।
ना आज बेदिली से , और ना ही ध्यान से वो ,
बातें जो मुँह से बोलूँ , सुनते न कान से वो ,
तुम देखना कि ख़ुद आ , इक दिन सुनेंगे दिल से ,
जब आँख ही से सब कुछ , कहना मैं सीख लूँगा ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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