■ मुक्तक : 976 – पढ़

तू पर्वत सा खड़ा अचल , सरिता सा बढ़-बढ़ जाएगा ।। एक उठा पग तुंग शिखर , टीले जैसा चढ़ जाएगा ।। मैं कविताओं का इक मोटा , ग्रंथ हज़ारों पन्नों का , एक पृष्ठ बस देख मेरा , फिर...Read more

■ मुक्तक : 975 – शीर ( दूध )

देखा है मैंने अक्सर , ऐसी जगह जहाँ पर , सूई न मिल सके वाँ , से तीर माँगते वो ।। भूखे फ़क़ीर से जा , कह-कह के उसको मालिक , खाने को इक कटोरा , भर खीर माँगते वो...Read more