देखा है मैंने अक्सर , ऐसी जगह जहाँ पर ,
सूई न मिल सके वाँ , से तीर माँगते वो ।।
भूखे फ़क़ीर से जा , कह-कह के उसको मालिक ,
खाने को इक कटोरा , भर खीर माँगते वो ।।
मासूम हैं कि अहमक़ , या चालबाज़ शातिर ;
सूरत से भी कहीं से , लगते ज़रा न पागल ;
फिर किसलिए खड़े हो , जा ठीक मैकदे के –
आगे गिलास लेकर , बस शीर माँगते वो ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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