■ मुक्तक : 977 – ख़्वाब

हैं नहीं मुम्किन कुछ ऐसी , मंज़िलों के ख़्वाब पाले ।। हाँ सहारो – थार में मैं , बादलों के ख़्वाब पाले ।। इक जुनूनी की तरह क्यों ,पाँव नंगे चल पड़ा हूँ , हाथ में इक बीज लेकर ,...Read more