दाने-दाने , पैसे-पैसे , के हैं जो मोहताज उनको ,
या बना दे मीर या फिर , इस तरह का कोई हल दे-
राह में गिरकर पड़े इक , फूल को ज्यों कोई गाड़ी ,
अपने पहियों से गुजरकर , चीटियों जैसा मसल दे ;
दे नहीं सकता दवा-दारू का गर ख़र्चा अरे तू ,
मौत आने तक जो सेहतमंद भी ना रख सके तू ,
हम ग़रीबों को बड़ी बीमारियाँ देने से बेहतर ,
ऐ ख़ुदा इक हादसे में , सिर हमारा तू कुचल दे ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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