मत ठोंक-पीट मुझको , गर हो सके तो सहला ।।

अब सह न पाउँगा मैं , सच वार कोई अगला ।।

उनकी नज़र में था मैं , कल तक दिमाग़ वाला ,

हूँ आज एक अहमक़ , बेअक़्ल और पगला ।।

कहते हैं वो उन्होंने , सूरत को देख मेरी ,

समझा था मुझको क्या-क्या , लेकिन मैं कुछ न निकला ?

लेते हैं लोग-बाग अक्सर  ख़ून-वून करके ,

लूँगा मैं ले के ख़ुद ही , की जाँ जहाँ से बदला ।।

जिसको भी देखिए वो , आ-आ बजा के चल दे ,

जैसे कि मेरा दिल इक , ढोलक हो या हो तबला ।।

लोहे के दुश्मनों को , कल ख़्वाब में पटककर ,

फूलों सरीखा रौंदा , कीड़ों के जैसा मसला ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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