■ मुक्तक : 979 – मोह

उसको पाने की हुई उम्मीद जब से ख़त्म रे , रात-दिन गोते लगाता हूँ मैं गहरे यास में ।। याद रोज़ आती है उसकी इस तरह भूखे को ज्यों , चटपटा खाना या पानी याद आए प्यास में ।। उसको...Read more