उसको पाने की हुई उम्मीद जब से ख़त्म रे ,
रात-दिन गोते लगाता हूँ मैं गहरे यास में ।।
याद रोज़ आती है उसकी इस तरह भूखे को ज्यों ,
चटपटा खाना या पानी याद आए प्यास में ।।
उसको सीने से लगाने की न कम हो ख़्वाहिशें ;
कर रहा अब भी उसे पाने की नाहक़ कोशिशें ;
वो जो धरती से है जितनी दूर सूरज उससे भी ,
है ज़ियादा दूर लेकिन है जो दिल के पास में ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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