■ मुक्तक : 980 – फ़रार

इस जहाँ की भीड़ में , निपट अकेला छोड़कर ।। यूँ गया कि ज्यों हुआ , फ़रार मुँह को मोड़कर ।। काश कह गया वो होता लौट कर न आएगा , रखते हम न उससे अब , तलक भी दिल...Read more