■ मुक्तक : 981 – नज़ारा

तेरे हुस्न का करके सिर्फ़ इक नज़ारा , फँसा था न मैं इश्क़ के जाल में जब ।। न मालूम था मुझको ग़म चीज़ क्या है ? न हरगिज़ था रिश्ता मेरा दर्द से तब ।। कि एक वक़्त था...Read more