सावन में झूला झूल ज्यों , उठाएँ लुत्फ़ लड़कियाँ ,
उससे कहीं ज़ियादा ही , उठा रहे हैं वो मज़ा ।।
जानूँ न किस बिना पे पर , सुना-सुना के रात-दिन ,
छोटी से छोटी बात पर , कड़ी से भी कड़ी सज़ा ?
वो चाहते हैं छूटना , मगर न छूट पा रहे ।
हो इश्क़ की गिरफ़्त में , वो मेरे फड़फड़ा रहे ।
करते हैं प्यार या कि कोई दुश्मनी निभा रहे ?
ख़्वाहिश दिमाग़ की है उनके कुछ है दिल की कुछ रज़ा ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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