■ मुक्तक : 983 – रवैया

होकर मैं फ़िक्रमंद तो , रोता नहीं कभी , आलम हो दिल में जब खुशी , का फूट रोऊँ मैं ।। तूफ़ान जब भी आए तो , घोड़े मैं बेचकर , चादर को लंबी तान भर , खर्राटे सोऊँ मैं...Read more